गंगा किनारे दफन ये लाशें अगर अखिलेश-मायावती या तेजस्वी के राज में होतीं तो हिंदू धर्म खतरे में आ जाता

0
213

गंगा किनारे दफ़नाए गए इन शवों का यह दर्दनाक दृश्य अगर मायावती, अखिलेश, हेमंत या तेजस्वी सरकार में दिख गया होता तो गोदी मीडिया के जातिवादी चरित्र वाले स्टूडियो में सनातन धर्म के सारे ग्रंथ खोल प्रवचन दे रहे होते। कुछ भगवाधारी साधु-महात्मा लानत-मलानत और श्लोक सुना रहे होते।

दलितों-पिछड़ो के हाथों में राजपाट होने को दोषी ठहरा रहे होते। हिंदू धर्म ख़तरे में होता। गंगा माँ ख़तरे में होती।

इंसानियत और मानवता पर भयानक ख़तरा मंडरा रहा होता।
ये सब सोशल मीडिया पर लिखा है- पॉलीटिकल स्ट्रेटजिस्ट यानी राजनीतिक रणनीतिकार संजय यादव ने।

एक अन्य फेसबुक पोस्ट के जरिए उन्होंने लिखा है- महामारी के इस दौर में जो दुर्गति इंसानों की इस लापरवाह व अहंकारी सरकार के कर कमलों से हुई वो अकल्पनीय है। लोग ऑक्सिजन, इंजेक्शन और ईलाज के अभाव में बिलखते, तड़पते और दम तोड़ते रहे।

यही ही नहीं, मरने के बाद उनके शवों के साथ जैसा बर्ताव किया वह अवर्णनीय है। शवों को कहीं भी फेंक दिया।

जलाने के लिए घंटो इंतज़ार करना पड़ा, कहीं भी दफ़ना दिया गया, पानी में बहा दिया गया, कुत्ते लाशों को नोचते रहे। और तो और अब अमानवीय भाजपा सरकार दफ़नाए गए उन शवों से रामनामी चुनरी भी हटवा रही है।

इतना सब होने के बावजूद भी कट्टर समर्थक मौन धारण कर हिंदुओं की संस्कृति और भावनाओं का अपमान करने वाली अपनी हिंदूवादी सरकार के कुकृत्यों पर चुप्पी खींच एक तरह से उसका मौन समर्थन ही कर रहे है। इनकी विवेकशीलता और सहनशीलता विचारणीय विषय है।

कल्पना कीजिए अगर ये दृश्य दूसरी सरकारों में देखने को मिलते तो ये अपने समर्थित मीडिया के ज़रिये कितने वोकल होते! और तो और मीडिया के प्रभाव और इनके हो-हल्ला के दबाव में उन सरकारों के समर्थक समूह भी अपने नेताओं से सवाल जवाब करते।

इसमें क्षेत्रीय विशेषकर वंचितों, वांछितों, उपेक्षितों और उत्पीडितों की बात करने वाले दलों के हमदर्दों और समर्थकों के लिए सीख है क्योंकि सत्ता प्राप्ति के लिए दिए गए “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” जैसे नारों से प्रभावित होकर कुछेक तटस्थ लोग बहक जाते है।

उन्हें लगने लगता है कि नीति निर्माण से लेकर निर्णय लेने में उन्हें अनुपातिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। लेकिन होता है इसका उल्टा- उन्हीं के समर्थन और सबके साथ और विश्वास के दम पर उन्हीं के आरक्षण जैसे अधिकारों को समाप्त किया जा रहा है, सार्वजनिक संस्थानों को बेचा जा रहा है, नौकरियाँ छीनी जा रही लेकिन वो खुश है।

दूसरी तरफ़ क्षेत्रीय दल अगर सत्ता प्राप्ति के लिए सबको साथ लेने की बात करते है तो इनके समर्थकों और सहानुभूति जताने वालों में एक अजीब सी घुटन और बेचैनी होने लगती है।

वो कहना शुरू कर देते है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है? सब क्या हमें वोट देते है? मतलब दूसरा सत्ता प्राप्ति के लिए सबको साथ लेने की बात करे तो इन्हें सुखद लगता है और अपने करें तो दुःखद।

अगर ये लोग इतनी ऊर्जा अपने लोगों को समझाने, जागरूक करने में लगाए तो फ़ायदा हो लेकिन ऐसा करेंगे नहीं इन्हें तो अपने दलों और नेताओं में 24 कैरेट शुद्धता चाहिए भले ही सत्ता प्राप्त ना हो।

अपने ही दल के वो मुखर आलोचक बन जाते है। जिस लोकतांत्रिक तरीक़े से अपने संबंधित दलों की नीतियों-निर्णयों का विरोध करना चाहिए उसी तरह उनका प्रचार-प्रसार भी करना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here