बिहार एक ऐसा गांव है हर साल बारिश का मौसम आते ही जिले के कई इलाकों में जल जमाव और बाढ़ जैसे हालात से लोगों की परेशानी बढ़ जाती है.

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 इस गांव का नाम है अकरहाराघाट. इस गांव के उत्तरी छोड़ पर नेपाल है. पूरब, पश्चिम और दक्षिण की ओर से ये गांव नेपाल से आने वाली अधवारा समूह की नदियों और कुछ बरसाती नदियों से घिरा है. दक्षिण की ओर से गांव तक पहुंचने के लिए एकमात्र सड़क है.

इस गांव का नाम है अकरहाराघाट. इस गांव के उत्तरी छोड़ पर नेपाल है. पूरब, पश्चिम और दक्षिण की ओर से ये गांव नेपाल से आने वाली अधवारा समूह की नदियों और कुछ बरसाती नदियों से घिरा है. दक्षिण की ओर से गांव तक पहुंचने के लिए एकमात्र सड़क है.

 हैरत की बात यह है कि इस सड़क में भी नदी के ऊपर जो पुल बना है वह भी अंग्रेजों के जमाने में ही लकड़ी से बनाया गया था. यह अब बिल्कुल ही जर्जर हालत में है.

हैरत की बात यह है कि इस सड़क में भी नदी के ऊपर जो पुल बना है वह भी अंग्रेजों के जमाने में ही लकड़ी से बनाया गया था. यह अब बिल्कुल ही जर्जर हालत में है.

 बाकी मौसम में तो नदियों में पानी नहीं रहने से पुल के नीचे से भी किसी तरह ग्रामीणों की आवाजाही हो जाती है, लेकिन बरसात के मौसम में अंग्रेजों के जमाने का ये जर्जर पुल ही ग्रामीणों का एकमात्र सहारा है.

बाकी मौसम में तो नदियों में पानी नहीं रहने से पुल के नीचे से भी किसी तरह ग्रामीणों की आवाजाही हो जाती है, लेकिन बरसात के मौसम में अंग्रेजों के जमाने का ये जर्जर पुल ही ग्रामीणों का एकमात्र सहारा है.

 हर साल यहां के लोग बरसात के मौसम में खुद ही बांस -बल्ला लगाकर पुल की मरम्मत करते हैं, लेकिन पानी की तेज धार में ग्रामीणों की मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती है.

हर साल यहां के लोग बरसात के मौसम में खुद ही बांस -बल्ला लगाकर पुल की मरम्मत करते हैं, लेकिन पानी की तेज धार में ग्रामीणों की मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती है.

 स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के मौसम में जरूरी सामान के लिए भी गांव से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. वहीं, किसी की तबीयत बिगड़ने पर भगवान ही मालिक है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के मौसम में जरूरी सामान के लिए भी गांव से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. वहीं, किसी की तबीयत बिगड़ने पर भगवान ही मालिक है.

 हर बार चुनाव के दौरान यहां के लोगों को पक्का पुल बनवाने का भरोसा दिया जाता है, लेकिन आजादी के 74 साल बीत जाने के बाद भी अकरहाराघाट गांव की तस्वीर जस की तस बनी हुई है.

हर बार चुनाव के दौरान यहां के लोगों को पक्का पुल बनवाने का भरोसा दिया जाता है, लेकिन आजादी के 74 साल बीत जाने के बाद भी अकरहाराघाट गांव की तस्वीर जस की तस बनी हुई है.

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