भारत में कोरोना की तीसरी लहर को लेकर IIT कानपुर का अहम रिसर्च जानें क्या कहते हैं नतीजे

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भारत में कोरोना की तीसरी लहर को लेकर IIT कानपुर का अहम रिसर्च जानें क्या कहते हैं नतीजे

कोरोना वायरस की तीसरी लहर ज्यादा ‘आक्रामक’ नहीं होगी, लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जबकि वायरस का म्यूटेंट तेजी से फैलने वाला ना हो. कोविड-10 के ‘सूत्र’ मॉडल के अनुमान में यह बताया गया है. सूत्र विश्लेषण के मुताबिक, यदि इतनी तेजी से फैलने वाला म्यूटेंट है, तो तीसरी लहर का असर ‘पहली लहर’ की तरह ही होगा.

कोरोना वायरस का ‘सूत्र’ विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों के दल का हिस्सा रहे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के प्रोफेसर मनिंदर अग्रवाल ने कहा कि उनलोगों ने तीन परिणाम तैयार किए हैं. उन्होंने कहा, ‘अगर कोरोना का म्यूटेंट तेजी से फैलने वाला नहीं है, तो तीसरी लहर ज्यादा घातक नहीं होगी और अगर ऐसा म्यूटेंट है तो फिर तीसरी लहर की आक्रामकतता पहली लहर जितनी होगी.’

1. पहला परिणाम- इसमें यह माना जा रहा है कि अगस्त तक जनजीवन सामान्य हो जाएगा और वायरस का कोई नया म्यूटेंट नहीं है.
2. दूसरा परिणाम- यहां वैज्ञानिकों का मानना है कि आशावादी नतीजों की संभावनाओं के अलावा टीकाकरण 20 प्रतिशत कम प्रभावी है.
3. तीसरा परिणाम- इसकी एक धारणा दूसरे नतीजे से अलग है. इसमें वैज्ञानिक यह मानकर चलते हैं कि एक नया, 25 प्रतिशत अधिक संक्रामक म्यूटेंट अगस्त में फैलता है.

इससे पहले इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) में प्रकाशित गणितीय ‘मॉडलिंग’ विश्लेषण पर आधारित एक अध्ययन में यह बताया गया था कि टीकाकरण के दायरे के विस्तार से कोरोना वायरस की तीसरी लहर को काफी हद तक कम किया जा सकता है. अध्ययन में ऐसे परिदृश्य की चर्चा की गई थी, जिसमें 40 प्रतिशत आबादी ने दूसरी लहर के तीन महीनों के भीतर दोनों खुराक ले ली हैं. इसमें कहा गया था कि टीकाकरण का प्रभाव संक्रमण की गंभीरता को 60 प्रतिशत तक कम करने के लिए है. अध्ययन के अनुसार इससे यह दिखता है कि संभावित तीसरी लहर के दौरान टीकाकरण गंभीरता को काफी हद तक कम कर सकता है.

भारत में कोविड-19 की तीसरी लहर की संभाव्यता: गणितीय मॉडलिंग आधारित विश्लेषण’ के लेखकों में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के संदीप मंडल, बलराम भार्गव और समीरन पांडा तथा इंपीरियल कॉलेज लंदन के निमलन अरिनामिनपति शामिल थे. तीसरी लहर के संबंध में चार परिकल्पनाओं पर विचार करते हुए अध्ययन में कहा गया है, संक्रमण-आधारित प्रतिरक्षा क्षमता समय के साथ कम हो सकती है, पहले से संक्रमित हुए लोग पुन: संक्रमित हो सकते हैं, भले ही मौजूदा वायरस अपरिवर्तित रहे

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