ऑनलाइन कंपनियां उत्‍पादों पर कैसे दे रहीं 80 फीसदी तक की छूट, भारतीय कारोबारियों ने की जांच की मांग

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ऑनलाइन कंपनियां उत्‍पादों पर कैसे दे रहीं 80 फीसदी तक की छूट, भारतीय कारोबारियों ने की जांच की मांग

देशभर के काराबारियों ने सभी राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों से ऑनलाइन कंपनियों के द्वारा ई-कॉमर्स पोर्टलों पर दी जा रही 10 से 80 फीसदी तक की छूट की जांच की मांग की है. कन्‍फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने इसके लिए सभी मुख्‍यमंत्रियों को पत्र भेजकर इन ई कॉमर्स पोर्टलों की छूट नीति को लेकर जीएसटी विभागों से जांच कराने की अपील की है. साथ ही देश में ई-कॉमर्स नियमों को लागू करने के लिए भी मुख्यमंत्रियों से समर्थन मांगा है.

कैट ने कहा कि बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा अपने ई-कॉमर्स पोर्टल पर बेचे जाने वाले सामानों की कीमतों को कृत्रिम रूप से कम करके सरकार को मिलने वाले जीएसटी राजस्व से बचाने की कोशिश की जा रही है. बड़ी ई कॉमर्स कंपनियां अपने पोर्टल पर बेचे जाने वाले सामान को वास्तविक बाजार कीमत से काफी कम दामों पर बेचते हुए राज्‍य सरकारों एवं केंद्र सरकार को जीएससटी राजस्व की बड़ी चोट पहुंचा रही हैं. जिस पर तुरंत ध्यान दिया जाना जरूरी है

कारोबारियों के इस संगठन की ओर से कहा गया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ई-कॉमर्स नियमों को भी तुरंत लागू किये जाने पर मुख्यमंत्रियों से समर्थन की जरूरतहै जिससे देश के वर्तमान ई-कॉमर्स व्यापार को प्रमुख ई-कॉमर्स कंपनियों के एकाधिकार से मुक्त किया जा सके. इस सम्बन्ध में कैट ने सभी मुख्यमंत्रियों से इस विषय पर विस्तृत बातचीत करने के लिए समय माँगा है और जल्द ही कैट के प्रतिनिधिमंडल राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस विषय पर मिलेंगे.

कैट के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बीसी भरतिया और महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने सभी मुख्यमंत्रियों को भेजे पत्र में कहा कि प्रमुख ई-कॉमर्स पोर्टलों पर बेचे जा रहे सामान को ये कंपनियां लागत से भी कम मूल्य या बाजार कीमत से काफी कम रख कर बेचती हैं या बड़े डिस्काउंट देती हैं. कई विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां हर साल विभिन्न प्रकार के सेल्स फेस्टिवल आयोजित कर रही हैं जिनमें अविश्वसनीय छूट दी जाती है जो बाजार कीमतों की तुलना में कीमत को कृत्रिम रूप से कम कर देती है. ई-कॉमर्स में एफडीआई नीति के तहत ये विदेशी कंपनियां केवल बिजनेस टू बिजनेस (बी2बी) व्यापार के लिए ही अधिकृत हैं जबकि वे पूरी तरह से उल्लंघन में सरकार की आँख और नाक के नीचे बिजनेस टू कंज्यूमर (बी2सी) बिक्री कर रही हैं. हालांकि नीति बनाना केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है लेकिन व्यापार राज्यों में होता है और इसलिए राज्यों को छोटे व्यापारियों और उपभोक्ताओं को इन कंपनियों के चंगुल से मुक्त करने और निष्पक्ष ई-कॉमर्स व्यापार सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार से तुरंत बात करनी चाहिए.

ऐसे बचाती हैं ये कंपनियां जीएसटी

खंडेलवाल ने प्रमुख ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा जीएसटी की कर वंचना पर तुरंत लगाम कसने की मांग करते हुए कहा की विशेष रूप से विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों के पोर्टल पर बड़ी संख्या में वस्तुओं की बिक्री उस वस्तु के बाजार मूल्य से कम है. जीएसटी कानून के अनुसार सरकार बाजार मूल्य पर जीएसटी लेने की हकदार है लेकिन यह वैश्विक ई-टेलर्स शिकार कृत्रिम रूप से माल की कीमतों को बेहद कम कर देते हैं और वास्तविक कीमत पर जीएसटी लेने के बजाय कृत्रिम बिक्री मूल्य पर जीएसटी लगाते हैं. उदाहरण के लिए अगर बाजार में किसी मोबाइल का वास्तविक बिक्री मूल्य 10,000 रुपये है तो सरकार 10,000 रुपये की दर पर जीएसटी प्राप्त करने की हकदार है जबकि इन कंपनियों के पोर्टलों पर उसी मोबाइल को कृतिम रूप से बहुत कम दर पर बेचा जाता है जैसे कि 6000 रुपये और इसी राशि पर ये पोर्टल जीएसटी चार्ज करते हैं. और इस तरह सरकारों को सीधे तौर पर जीएसटी राजस्व की चोट पहुंचाते हैं. आश्चर्य की बात है की अभी तक केंद्र सरकार या किसी भी राज्य सरकार के जीएसटी विभाग ने जीएसटी राजस्व के इस तरह की कर वंचना पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है.

त्‍यौहार बिक्री में दी जाती है मोटी छूट

इसी तरह ये बड़े ई-टेलर्स साल भर त्योहार बिक्री का आयोजन करते हैं और ग्राहकों को लुभाने के लिए 10% से 80% तक की उच्च छूट देते हैं जो और कुछ नहीं बल्कि कृत्रिम मूल्य निर्धारण है जो एक जानबूझकर पैदा की गई विसंगति है जिससे सरकारों को जीएसटी राजस्व का भारी नुकसान होता है. सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मांग की है कि वे अपने-अपने जीएसटी विभागों को इन कंपनियों के बिक्री पैटर्न की पर्याप्त जांच करने और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दें.

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