लॉकडाउन,में ऐसा नज़ारा आपने देखा होगा गाड़ी आते ही बंदर कुत्ते उसकी ओर लपक पड़

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लॉकडाउन,में ऐसा नज़ारा आपने देखा होगा गाड़ी आते ही बंदर कुत्ते उसकी ओर लपक पड़

ऐसा नज़ारा शायद आपने कम ही देखा हो. गाड़ी आते ही बंदर और कुत्ते उसकी ओर लपक पड़ते हैं. लोग उतरकर बंदर को प्रेम से केला देते हैं, कुत्ते को दूध पिलाते हैं, गाय को चारा खिलाते हैं. तालाब में बतख और मछली को ब्रेड का टुकड़ा देते हैं. ये सभी किसी के पालतू जानवर नहीं हैं. लॉकडाउन  में सब कुछ बंद हो गया तो इनके भूखे मरने की नौबत आ गई थी. ग्रेटर नोएडा की एक टीम ने इस काम का बीड़ा उठाया है. टीम के सदस्य सरदार मंजीत सिंह कहते हैं कि लॉकडाउन की वजह से जीव-जन्तुओं को खाना नहीं मिलता था, इस वजह से वह हाइपर हो जाते थे. बच्चों को काट खाने दौड़ते थे, पर अब ऐसा नहीं है. अब खाकर ये शांत पड़े रहते हैं

इनके मुताबिक, जब तक वह इन जानवरों को खाना नहीं खिलाते हैं, तब तक उनकी दिनचर्या शुरू नहीं होती है. ऐसे बेज़ुबानों की मदद के लिए ग्रेटर नोएडा की एक्टिव सिटिजन टीम के लोग सामने आए हैं. पिछले साल लॉकडाउन का अनुभव इस बार और काम आया. तब भी इन बेज़ुबानों की ऐसी ही मदद की गई थी. नतीजा जानवर भी किसी तरह का डर छोड़ खाने के लिए ऐसे आने लगे जैसे कब से जानते हों

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इस टीम के हरिंदर भाटी ने बताया कि पहले तो हमें भी इनसे डर लगता था, अब तो लगता है कि ये दोस्त बन गए हैं. प्यार से बंदर को अब केला खिला पाते हैं. कोई छीना-झपटी नहीं करता है. दरअसल लॉकडाउन के दौरान जब इन बेजुबानों को भूखा देखा तो इनका मन विचलित हो गया. तभी से इस मिशन की शुरुआत हुई. पिछले सात महीने से यह काम जारी है और आगे भी जारी रहेगा

इतना ही नहीं, तालाबों की मछलियों और बतखों का भी खयाल रखा गया है. यह सब बिना किसी सरकारी मदद के किया जा रहा है. समाजसेवी मनोज गर्ग कहते हैं कि हम लोग खुद पैसा जमा करके इनको खिलाते हैं. न कोई सरकार मदद करती है और न ही वे लोग किसी राजनैतिक दल से जुड़े हैं. वहीं इस अभियान से जुड़े रहिसुद्दीन सिद्दकी कहते हैं कि उनके हिसाब से इन बेजुबानों की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, इसलिए वो रोजाना गाय और बंदरों को खाना खिलाते हैं. इस काम में समाज के हर वर्ग के लोग इस आपदा में ऐसे ही निस्वार्थ भाव से सामने आएं. ये मिसाल है कि जब सिस्टम चरमरा जाते हैं तो उसे संभालने के लिए जनता के बीच से इसी तरह हीरो निकलते हैं

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